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एंटी बैक्टीरिया और साधारण साबुन एक समान

– जिस तरह से आम लोग हाथ धोते हैं उसमें कोई भी साबुन एक जैसा काम करेगा, नए अध्‍ययन ने किया है यह दावा
– कोरिया के वैज्ञानिकों ने की रिसर्च, नौ घंटे के इस्तेमाल पर सामने आया फर्क इससे कम समय में सब एक बराबर रहे

हममें से कई लोग एंटी बैक्टीया वाला साबुन यह सोचकर चुनते हैं कि इसकी बदौलत हम कीटाणुओं से बचे रहेंगे। मगर एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि बैक्टीरिया को मारने के मामले में यह आम साबुन से ज्यादा कारगर नहीं होता।
लोगों को यह उम्मीद होती है कि एंटी बैक्टीरिया वाला साबुन ज्यादा कीटाणुओं का सफाया करता है। अगर आप विज्ञापनों पर ध्यान दें तो देखेंगे कि बहुत से साबुनों ने अपनी बैक्टीरिया को मारने की एक्सट्रा ताकत का बखान किया हुआ है। तेज साबुन, स्लो साबुन वगैरा से भी कैंपेन चलाए जा रहे हैं।
कोरिया के वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया पर ट्राइक्लोसेन के असर को परखा। यह वह तत्व है जो ज्यादातर इस तरह के सभी उत्पादों पर इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने देखा कि इसमें बैक्टीरिया को मारने की कितनी काबीलियत है। वैज्ञानिकों ने 20 तरह के दाग धब्बे पर इसे अपनाया। शोधकर्ताओं ने गर्मी व सर्दी का ठीक वैसा ही माहौल बनाया, जिनमें आम आदमी हाथ धोता है। बैक्टीरिया को मारने के लिए 0.3 फीसदी ट्राइक्लोसेन इस्तेमाल किया गया। कानूनन इतना ही इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि ट्राइक्लोसेन ने ढेर सारे बैक्टीरिया मारे मगर नौ घंटे में। जबकि हाथ धोने में हम जितना समय लगाते हैं उसमें उतने बैक्टीरिया की सफाई हुई, जितना कोई भी आम साबुन कर देता है।
वैज्ञानिक यही नहीं रुके। उन्होंने लैब में टेस्ट करने के बाद 16 लोगों को दोनों तरह के साबुन इस्तेमाल करने को कहा। नतीजों में कुछ खास अंतर नजर नहीं आया। इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले कोरिया यूनिवर्सिटी के डॉक्टर मिन सुब री का कहना है कि एंटी बैक्टीरियल साबुन के प्रभाव, विज्ञापन और उपभोक्ता इस बारे में क्या सोचते हैं इस पर विचार करना चाहिए।
आपको बता दें कि वैज्ञानिक यह बात भी साबित कर चुक हैं कि महंगे और सस्ते टूथपेस्थ की काबीलियत में भी कोई खास फर्क नहीं होता है।

स्रोत – डेली मेल

 

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